साढ़े पंद्रह वर्षों की कैद के बाद निर्दोष!निर्दोष बताते हुए रिहा करने का आदेश दिया।

साढ़े पंद्रह वर्षों की कैद के बाद निर्दोष!

कल 13 जनवरी, 2021 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जून 2005 से जेल में बंद आशीष को निर्दोष बताते हुए रिहा करने का आदेश दिया।
आशीष करीब 18-19 वर्ष का था जब उसे हत्या के मामले में कानपुर जेल भेजा गया था। पैरवी के अभाव में उसे 8 वर्षों बाद जून 2013 में उम्रकैद की सज़ा हो गयी थी। उसके बाद उसे सजा काटने के लिए फतेहगढ़ सेंट्रल जेल भेज दिया गया था। इन साढ़े पंद्रह वर्षों में हाई कोर्ट में कभी भी उसकी जमानत याचिका पर बहस नहीं हुई थी। कभी पैरवी नहीं, कभी वकील नहीं पहुंचा और कभी न्यायालय को फुरसत नहीं। आंख पर पट्टी बांध चुकी न्याय की देवी को तो महंगी कीमत पर ऊंची आवाज वाले अभियुक्तों  और उनके वकीलों की ही आवाज़ सुनाई देती है।
जब 9 फरवरी, 2010 को कानपुर जेल में बंद हुए थे तो आशीष मुलाहिज़ा बैरक का राइटर था। तेज दिमाग और ईमानदार छबि का नौजवान। हम लोगों को मुलाहिज़ा बैरक में रुकना तो नहीं था पर उसने हमें अलग-अलग सर्किल और बैरक में भेजवाया था। तबसे मेरा उससे संवाद रहा। कम बोलने वाला और अपनी जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभाने वाला युवक है। उसकी सजा के बाद ही आर्डर देखकर लगा कि उसे गलत सज़ा हुई है।
2019 में उसने सेंट्रल जेल फतेहगढ़ से चिट्ठी भेजकर मुझसे अपनी पैरवी का अपील किया। वह कई वकीलों को बदलकर और कुछ धन देकर थक चुका था। अब न उसके पास कोई पैरोकार था और न ही धन।
मेरे पहचान के एक रहमदिल इंसान अधिवक्ता समीउज़्ज़मा खां इलाहाबाद हाई कोर्ट में वकील हैं। वे जेलों में बंद कैदियों जिनकी कोई पैरवी नहीं है या गरीब है तो उनके जमानत व अपील की पैरोकारी निःशुल्क या बहुत कम फीस पर करते हैं। आशीष के मामले में जेल द्वारा वकालतनामे पर उसके हस्ताक्षर से लेकर, उसकी फ़ाइल निकलने तक सारा काम उन्होंने अपने खर्च पर किया और पैरवी में लगे रहे। लाकडाउन के दौरान तो पुराने केसों की सुनवाई ही बन्द रही। आशीष के मामले पर वे urgency एप्लीकेशन लगाते रहे। अंततः 25 नवम्बर, 2020 को आशीष के मामले में पहली बार कोई बहस हुई। दोनों जज इसबात पर अचंभा व्यक्त किए की साढ़े पन्द्रह वर्षों में एकबार भी आशीष की जमानत पर बहस नहीं हुई है। और कुल 2:30-3:00 घंटे सुनवाई चली। और जजमेंट रिज़र्व हो गया। कल 13 जनवरी को जजमेंट आया जिसमें आशीष को निर्दोष बताया गया।
पर उसके जीवन सबसे कीमती हिस्से पूरी जवानी को कैद में नष्ट कर दिया गया। इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? उसके जीवन की क्षति को कोई पूरा कर पाएगा? इसके लिए पुलिस, न्यायालय और सबसे बढ़कर यह अमानवीय व्यवस्था जिम्मेदार है। यदि किसी के जीवन के साथ ऐसे खिलवाड़ के लिए पुलिस, जांच संस्थाओं, न्यायाधीशों और सरकार को दोषी बताते हुए सज़ा और जुर्माने का प्रावधान होता तो शायद ऐसा नहीं होता।
आशीष जैसे लाखों असहाय बन्दी अनावश्यक जेल की सज़ा काट रहे हैं। सबको रहमदिल समीउज़्ज़मा खान जैसे अधिवक्ता कहां मिल पाते?