रामचरितमानस की सीख

रामचरितमानस की सीख

श्रीरामचरितमानस कि उपरोक्त पंक्तियों में सुग्रीव को आश्वासन देते हुए भगवान श्री राम संत और मित्र के गुरु के जरिए यह बताना चाह रहे हैं कि वस्तुतः मित्रता का निर्वाहन तो संत ही करता है या फिर जो ऐसा करें वह संत है संत किसी वेश का नाम ना कभी था नाही है वह तो चरित्र का नाम है

जो अपने मित्र के गुणों को सार्वजनिक करें  उसे सुपंथ से निकालकर श्रेष्ठ मार्ग पर लगाने में पूरा सहयोग दें ताकि मित्र का चरित्र सार्वजनिक करने में संकोच ना हो उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात भी कही की मित्र को मित्र से कुछ लेने और देने में संकोच नहीं करना चाहिए

यदि एक मित्र हमेशा देता रहे और दूसरा लेता रहे तो लेने वाले मित्र में हीनता का भाव आए बगैर नहीं रहेगा इसीलिए भगवान ने सुग्रीव को दिया भी और वे यदि सीता जी की खोज में कुछ योगदान दे सकते हैं और यदि उनसे उनका स्वाभिमान बना रहता है तो उनकी सेवा लेना राम और राम राज्य की विचारधरा के अंतर्गत है दिन बना कर देना सांसारिक ता है