राजनीति अदालत में काला कोट पहनकर वकालत या विश्वविद्यालयों में टाई पहनकर प्राध्यापिकी का नाम नहीं है

राजनीति अदालत में काला कोट पहनकर वकालत या विश्वविद्यालयों में टाई पहनकर प्राध्यापिकी का नाम नहीं है

पटना  --  राजनीति अदालत में काला कोट पहनकर वकालत या विश्वविद्यालयों में टाई पहनकर प्राध्यापिकी का नाम नहीं है , और न ही राजनीति का मतलब  या ' सफेद कॉलर ' लोगों का धंधा मात्र है । असल राजनीति तो गाँव - गरीबों की भूख , बेबसी , वेदना , त्रासदी के थपेड़ों को झेलकर जनपथ से चलकर राजपथ पर आने का नाम है । मुझे हँसी आती है इस बात पर कि इस कठिन यात्रा से गुजरने वाला राजनीति का कोई योद्धा मुकदमों से वंचित कैसे रह सकता है ? जो राजनीति ' चार्जशीटेड ' होने से डरी - सहमी रहेगी उससे जनता की कौन सी अपेक्षाएँ पूरी हो सकती है ? इसलिए मैं चुनाव आयोग के इस प्रस्ताव को एक आयामी मानता हूँ , जिसे राजनीति के बहुआयामी स्वरूप की रंच मात्र भी जानकारी नहीं है ।मेरा ऐसा कहने का मतलब यह कदापि नहीं है कि मैं राजनीति के अपराधीकरण या अपराध के राजनीतिकरण के पक्ष में हूँ , लेकिन मेरा विनम्र आग्रह है कि अपराध के राजनीतिकरण पर चिंता से पहले हमें सत्ता पर बैठे लोगों द्वारा व्यवस्था के राजनीतिकरण पर घोर चिंता करनी चाहिए । राजनीतिकरण हो चुकी नौकरशाही को फिर से मुक्त करानी चाहिए और उसे स्वतंत्रता , निष्पक्षता एवं ईमानदारी से कार्य करने के अवसर के साथ- साथ उन्हें उनकी जेम्मेदारियों के प्रति उत्तरदायी बनाना चाहिए । कारण अपराध के राजनीतिकरण से कई गुणा ज्यादा खतरनाक है , नौकरशाही का राजनीतिकरण ।

         हम मानते हैं कि अपराध के राजनीतिकरण की तरफ लोगों की चिंता वाजिब है और यह भी सच है कि हमारी इन गंभीर चिंताओं के बावजूद लोकतंत्र को ठेंगा दिखाकर ऐसे तत्व धड़ल्ले से जनतंत्र के पवित्र मंदिरों ससंद और विधान मंडल में प्रवेश पा रहे हैं , जो आसन्न खतरों के स्पष्ट संकेत है । सवाल है ,इन्हें रोका कैसे जाये ? सिर्फ चुनाव आयोग के प्रयासों से इस पर बंदिशें नहीं लग सकती ।अगर सही अर्थों में हम इस पर लगाम चाहते हैं तो बुद्धिजीवियों , न्यायविदों , अखबारनवीसों  , समाजशास्त्रियों , ईमानदार राजनेताओं और हर तबके के प्रबुद्ध लोगों को मिल - बैठ कर इस पर सोचना होगा और इन सबसे अलग आमजन को इस आसन्न खतरे से आगाह कर उसके अंदर ऐसे तत्वों के खिलाफ जागरूकता का संचार करना होगा । इन्हें इसके अच्छे - बुरे परिणामों से अवगत कराना होगा ,क्योंकि आखिर जनता ही जनतंत्र का असली मालिक है ।

        राजनीति के अपराधीकरण पर गिट - पिट बातें करनेवाले कथित बुद्धिजीवी चुनावों में उन पार्टियों के उन नेताओं को अपना निशाना क्यों नहीं बनाते जो बेहयाई की हदें पार कर माफिया सरगनाओं और धनपशुओं को टिकटें बांटते हैं । अगर आम चुनाव के ऐन वक्त किन्हीं कारणों से इन्हें नंगा नहीं कर पाते , इन सबके खिलाफ एक माहौल तैयार करने में नकारा साबित होते हैं तो चुनावोपरांत इनपर शोर मचाने या विधवा - विलाप का उन्हें कोई नैतिक हक नहीं है ।

        हर युग में यथास्थितिवाद के खिलाफ परिवर्तन की लड़ाई लड़नेवाला व्यक्ति अपराधी घोषित हो गया । जारशाही के खिलाफ लड़नेवाला लेनिन , चियांग काईशेक की व्यवस्था को चुनौती देनेवाला माओ - त्से - तुंग , अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ जंग छेड़ने वाला हो - चि - मिन्ह हो या अंग्रेजों के खिलाफ अहिंसक संघर्ष के प्रणेता महात्मा गांधी , सभी के सभी तत्कालीन सत्ता की नजर में अपराधी थे और 'चार्ज शीटेड' ही नहीं 'हिस्ट्रीशीटर' भी । मैं यहाँ 'आजाद हिंद फौज' के सेनानायक और भारत में सशस्त्रक्रांति के जनक नेताजी सुभाष चन्द्र और चंद्रशेखर आज़ाद की बात नहीं करता , न ही लाहौर कांड से लेकर एसेम्बली बम कांड के नायक शहीदे - ए - आजम भगत सिंह की बातें कर रहा हूँ , लेकिन मैं इतना जानता हूँ कि आजाद भारत में भी डॉ० लोहिया और  जयप्रकाश जेल , मुकदमों एवं 'चार्जशीटेड' होने से वंचित नहीं रहे । 

          महान समाजवादी चिंतक डॉ० लोहिया ने कहा-  "जेल - वोट - फावड़ा" । उन्होंने वोट , ' पवार पोलिटिक्स को जेल और  फावड़ा  यानि संघर्ष और रचना से जोड़ने की बात कही । सुप्रसिद्ध समाजवादी लेखक स्व० रामवृक्ष बेनीपुरी ने 'गेंहू और गुलाब' की बात की । गेहूँ यानि रोटी जहाँ रचना और संघर्ष का प्रतीक है , वहीं गुलाब को उन्होंने वैचारिक खुशबू का पर्याय माना । भारत में युवा क्रांतिकारीयों के प्रेरणा - पुंज, शहीदे - ए - आजम भगत सिंह ने इसे अपने तरीके से कहा कि -   'क्रांति की तलवार विचारों की शान पर तेज़ होती है ।' यह सच है कि "संघर्ष , रचना और सिद्धान्त , राजनीति के मन , शरीर और आत्मा हैं" । इनमें किसी को छोड़कर राजनीति अपने आप में पूर्ण नहीं है । आखिरकार हमें हर - हाल में इस हकीकत को समझना और स्वीकारना ही होगा ।