मध्यवर्गीय को ले डूबा करोना का लाकडाउन साजिश यह कुछ और"करोना लाकडाउन का असर हर किसी पर पड़ा है

मध्यवर्गीय को ले डूबा करोना का लाकडाउन साजिश यह कुछ और

मध्यवर्गीय को ले डूबा करोना का लाकडाउन साजिश यह कुछ और"करोना लाकडाउन का असर हर किसी पर पड़ा है पर सबसे अधिक नुकसान मध्यवर्गीय का हुआ है! क्यो कि गरीब मजदूर के लिए सरकार से लेकर सरकारी गैर सरकारी संगठन ने भी राशन भोजन का प्रबंध किया था पर मध्यवर्गीय लोगो के लिए न पहले से कोई सुविधा उपलब्ध था न आज है मध्यवर्गीय रोज कमाये तो अपने परिवार को खिलाये नही तो भूखा खुद सोये और परिवार को सुलाये!मध्यवर्गीय न तो अमीर होता है न ही गरीब होता है इस लिए मध्यवर्गीय पर न नजर सरकार की पड़ती है न किसी संघटन की मध्यवर्गीय न तो भीख मांग सकता है न लाइन में लग के दो पूड़ी य एक प्लेट तहरी ख सकता है न ही एक किलो आटा चार आलू एक पाकेट नमक के पीछे भाग सकता है!मध्यवर्गीय इंसान चाय पान की दुकान कर लेगा ठेला लगा लेगा आठ हजार पर नौकरी कर लेगा पर मजदूरी नही कर पायेगा लाकडाउन में न तो दुकानदारी कर पाया न ही प्राइवेट नौकरी ऐसे में इन लोगो के पास कितना बैलेंस रहा होगा जो बैठ कर खाते रहें!अभी भी हफ्ते में दो दिन लाकडाउन लगता है और मध्यवर्गीय लोगो के सारे काम धंधे बंद रहते हैं!जबकी सरकारी शराब के ठेके मुर्गा मछली बकरा की दुकाने खुली रहती हैं!एक मध्यवर्गीय के दुकान पर चार लोग से अधिक इक्ट्ठा हो जायें तो पुलिस डंडे पीटना शुरु कर देती है पर वहीं शराब के ठेके पर मीट के दुकानो पर न तो कोई सोशल डिस्टेंस होता है न ही अधिक तर लोग मास्क लगाये होते हैं भीड़ भी देखने को मिलता है!सवाल अब ए उठता है कि करोना वायरस शराब के ठेको पर मुर्गा मछली बकरा के दुकानो पर अटैक नही करता य फिर जान बूझ कर करोना वायरस को शराब के ठेके व मीट के दुकानो द्वारा फैलाया जा रहा है और मध्यवर्गीय इंसानो को गुमराह करके रोजी रोटी पर अंकुश लगाया जा रहा है!मेरा मतलब किसी को भड़काने य किसी के दिल को ठेस पंहुचाने के लिए नही है मैं देख रहा हूं करोना महामारी को लेकर पुलिस प्रशासन डाक्टर सफाई कर्मी पत्रकार तमाम संस्थाओ के लोग अपनी जान के वैगर परवाह किये करोना से लड़ रहे हैं रात दिन सब एक कर रहे हैं  तो शराब के ठेके मीट की दुकानो पर लापरवाही क्यों!